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Wednesday, 23 May 2012


|| हनुमत तुम्ही हो पालनहार ||

नहीं मिला है और किसी को सियाराम से ये अधिकार |
केवल तुम ही सुन सकते हो दीन-हीन की चीख पुकार ||

इस कलयुग में सिर्फ चलेगा हनुमान तेरा ही सिक्का |
हनुमत तेरे आगे नहीं चलेगा कोई भी इक्का-दुक्का ||
तुम्ही कर सकते हो स्वामी दीन दुखियों का बेडा पार |
क्योकि तुम्हे दिया है सियाराम ने इन कामो का अधिकार ||

कलयुग में उद्धार सभी का होगा पवनपुत्र तेरे ही हाथ |
सियाराम का आशीर्वाद फलेगा जब होगा तुम्हारा साथ ||
इस कलयुग में तुम्ही रहोगे प्रभु के कामो के आधार |
क्योकि तुम्ही ही कर सकते हो प्रभु के भक्तो का उद्धार ||

भली तरह से देखकर ही ‘श्याम’ तेरी शरण में आया |
क्योकि तेरे द्वार से बढ़कर उसे कोई द्वार नहीं भाया ||
बड़ा भरोसा हैं मुझको प्रभु नहीं करोगे तुम इनकार |
क्योकि तुम्ही हो प्रभु हम भक्तो के सबसे बड़े पालनहार ||

संकटमोचन हनुमानाष्टक

बाल समय रवि भक्षी लियो तब तीनहुं लोक भयो अँधियारो I

ताहि सो त्रास भयो जग को यह संकट काहू सो जात न टारो II
देवन आनि करी बिनती तब छाड़ दियो रवि कष्ट निवारो I
को नहीं जानत है जग में कपि संकट मोचन नाम तिहारो II

बालि की त्रास कपीस बसे गिरि जात महा प्रभु पंथ निहारो I
चौंकि महा मुनि श्राप दियो तब चाहिये कौन बिचार बिचारो II
कै द्विज रूप लिवाय महा प्रभु सो तुम दास के शोक निवारो I
को नहीं जानत है जग में कपि संकट मोचन नाम तिहारो II

अंगद के संग लेन गये सिया खोज कपीस यह बैन उचारो I
जीवत ना बचिहौ हम सो जो बिना सुधि लाये यहाँ पगु धारौ II
हेरि थके तट सिन्धु सबै तब लाये सिया सुधि प्राण उबारो I
को नहीं जानत है जग में कपि संकट मोचन नाम तिहारो II

रावण त्रास दई सिया को सब राक्षसि सों कहि शोक निवारो I
ताहि समय हनुमान महाप्रभु जाय महा रजनी चर मारो II
चाहत सिया अशोक सों आगिसु दें प्रभु मुद्रिका शोक निवारो I
को नहीं जानत है जग में कपि संकट मोचन नाम तिहारो II

बाण लाग्यो उर लक्ष्मण के तब प्राण तज्यो सुत रावण मारो I
ले गृह वैद्य सुषेन समेत तवै गिरि द्रोण सो वीर उपारो II
आनि सजीवन हाथ दई तब लक्ष्मण के तुम प्राण उबारो I
को नहीं जानत है जग में कपि संकट मोचन नाम तिहारो II

रावण युद्ध अजान कियो तब नाग कि फाँस सबै सिर दारो I
श्री रघुनाथ समेत सबै दल मोह भयो यह संकट भारो II
आनि खगेस तबै हनुमान जु बंधन काटि सुत्रास निवारो I
को नहीं जानत है जग में कपि संकट मोचन नाम तिहारो II

बंधु समेत जबै अहि रावण लै रघुनाथ पातळ सिधारो I
देविहिं पूजि भलि विधि सो बलि देउ सबै मिलि मंत्र विचारो II
जाय सहाय भयो तब ही अहि रावण सैन्य समेत संघारो I
को नहीं जानत है जग में कपि संकट मोचन नाम तिहारो II

काज किये बड़ देवन के तुम वीर महा प्रभु देखि बिचारो I
कौन सो संकट मोर गरीब को जो तुम सों नहिं जात है टारो II
बेगि हरो हनुमान महा प्रभु जो कछु संकट होय हमारो I
को नहीं जानत है जग में कपि संकट मोचन नाम तिहारो II

लाल देह लाली लसे ,अरु धरि लाल लंगूर I
बज्र देह दानव दलन,जय जय जय कपि सूर II



दोहा
श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मनु मुकुर सुधारि I
बरनऊ रघुबर विमल जसु, जो दायक फल चारि II
बुद्धिहीन तनु जानिके , सुमरो पवन -कुमार I
बल बुद्धि विद्या देहु मोहे , हरहु कलेश विकार II
चोपाई
जय हनुमान ज्ञान गुण सागर I जय कपीस तिहुँ लोक उजागर II
राम दूत अतुलित बल धामा I अंजनी पुत्र पवन सूत नामा II
महाबीर बिक्रम बजरंगी I कुमति निवार सुमति के संगी II
कंचन बरन बिराज सुबेषा I कानन कुंडल कुंचित केशा II
हाथ वज्र औ ध्वजा बिराजे I कांधे मूँज जनेऊ साजे II
शंकर सुवन केसरीनंदन I तेज प्रताप महा जग बंधन II
विद्यावान गुणी अति चातुर I राम काज करिवे को आतुर II
प्रभु चरित सुनिवे को रसिया I राम लखन सीता मन बसिया II
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा I विकत रूप धरि लंक जरावा II
भीम रूप धरि असुर संहारे I रामचंद्र के काज संवारे II
लाये संजीवन लखन जियाये I श्रीरघुवीर हरिष उर लाये II
रघुपतिi किन्ही बहुत बड़ाई I तुम मम प्रिय भरत सम भाई II
सहस बदन तुम्हारो जस गावें I आस कहीं श्रीपति कंठ लगावें II
सनकादिक ब्रह्मादी मुनीशा I नारद शरद सहित अहिशा II
जम कुबेर दिगपाल जहाँते Iकवि कोविद कहिं सकें कहाँतें II
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा I राम मिलाये राज पद दीन्हा II
तुम्हरो मंत्र विभीषण मन I लंकेश्वर भये सब जग जाना II
जुग सहस्त्र जोजन पर भानु I लील्यो ताहि मधुर फल जानू II
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहि I जलधि लांघी गए अचरज नाहिं II
दुर्गम काज जगत के जेते I सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते II
राम दुआरे तुम रखवारे I होत न आज्ञा बिनु पैसारे II
सब सुख लहैं तुम्हरी शरना I तुम रक्षक काहू को डरना II
आपन तेज सम्हारो आपै I तीनो लोक हाकते कापें II
भूत पिशाच निकट नहीं आवै I महावीर जब नाम सुनावै II
नाशै रोग हरे सब पीरा I जपत निरंतर हनुमत वीरा II
संकट ते हनुमान छुड़ावै I मन क्रम बचन ध्यान जो लावै II
सब पर राम तपस्वी रजा I तिन के काज सकल तुम सजा II
और मनोरथ जो कोई लावै I सौई अमित जीवन फल पावै II
चारो जुग प्रताप तुम्हारा I है प्रसिद्द जगत उजियारा II
साधू संत के तुम रखवारे I असुर निकन्दन राम दुलारे II
अष्ट सिद्धि नवनिधि के दाता I अस बार दीन जानकी माता II
राम रसायन तुम्हारे पासा I सदा रहो रघुपति के दासा II
तुम्हरे भजन राम को पावै I जनम जनम के दुःख बिसरावे II
अंत काल रघुबर पुर जाई I जहाँ जनम हरी भक्त कहाई II
और देवता चित्त न धरई I हनुमत सोयी सर्व सुख करई II
संकट कटे मिटे सब पीरा I जो सुमरे हनुमत बलवीरा II
जै जै जै हनुमान गोंसाई I कृपा करहू गुरु देव की नाईं II
जो सत बार पाठ करे कोई I छूटे बन्दी महा सुख होई II
जो यह पड़े हनुमान चालीसा I होय सिद्धि साखी गोरिसा II
तुलसीदास सदा हरि चेरा I कीजे नाथ ह्रदय मैं डेरा II
दोहा
पवन तनय संकट हरण , मंगल मूर्ति रूप I
राम लखन सीता सहीत , ह्रदय बसहु सुर भूप II


श्री सालासर हनुमान जी की आरती ।।

जयति जय जय बजरंग बाला, कृपा कर सालासर वाला ॥

चैत सुदी पूनम को जन्मे, अंजनी पवन खुशी मन में ।
प्रकट भए सुर वानर तन में, विदित यश विक्रम त्रिभुवन में ।
दूध पीवत स्तन मात के, नजर गई नभ ओर ।
तब जननी की गोद से पहुंच, उदयाचल पर भोर ।
अरुण फल लखि रवि मुख डाला ॥ कृपा कर सालासर वाला …

तिमिर भूमण्डल में छाई, चिबुक पर इंद्र वज्र बाए ।
तभी से हनुमत कहलाए, द्वय हनुमान नाम पाए ।
उस अवसर में रुक गयो, पवन सर्व उन्चास ।
इधर हो गयो अंधकार, उत रुक्यो विश्व को श्वास ।
भए ब्रह्मादिक बेहाला ।। कृपा कर सालासर वाला …

देव सब आए तुम्हारे आगे, सकल मिल विनय करन लागे ।
पवन कू भी लाए सांगे, क्रोध सब पवन तना भागे ।
सभी देवता वर दियो, अरज करी कर जोड़ ।
सुनके सबकी अरज गरज, लखि दिया रवि को छोड़ ।
हो गया जग में उजियाला ॥ कृपा कर सालासर वाला …

रहे सुग्रीव पास जाई, आ गए वन में रघुराई ।
हरी रावण सीतामाई, विकल फिरते दोनों भाई ।
विप्र रूप धरि राम को, कहा आप सब हाल ।
कपि पति से करवाई मित्रता, मार दिया कपि बाल ।
दुःख सुग्रीव तना टाला ॥ कृपा कर सालासर वाला …

आज्ञा ले रघुपति की धाया, लंक में सिंधु लांघ आया ।
हाल सीता का लख पाया, मुद्रिका दे वनफल खाया ।
वन विध्वंस दशकंध सुत, वध कर लंक जलाय ।
चूड़ामणि संदेश सिया का, दिया राम को आय ।
हुए खुश त्रिभुवन भूपाला ॥ कृपा कर सालासर वाला …

जोड़ी कपि दल रघुवर चाला, कटक हित सिंधु बांध डाला ।
युद्ध रच दीन्हा विकराला, कियो राक्षसकुल पैमाला ।
लक्ष्मण को शक्ति लगी, लायौ गिरी उठाय ।
देइ संजीवन लखन जियाए, रघुबर हर्ष सवाय ।
गरब सब रावन का गाला ॥ कृपा कर सालासर वाला …

रची अहिरावन ने माया, सोवते राम लखन लाया।
बने वहां देवी की काया, करने को अपना चित चाया ।
अहिरावन रावन हत्यौ, फेर हाथ को हाथ ।
मंत्र विभीषण पाय आप को, हो गयो लंका नाथ ।
खुल गया करमा का ताला ।। कृपा कर सालासर वाला …

अयोध्या राम राज्य कीना, आपको दास बना दीना ।
अतुल बल घृत सिंदूर दीना, लसत तन रूप रंग भीना ।
चिरंजीव प्रभु ने कियो, जग में दियो पुजाय ।
जो कोई निश्चय कर के ध्यावे, ताकी करो सहाय ।
कष्ट सब भक्तन का टाला ॥ कृपा कर सालासर वाला …

भक्तजन चरण कमल सेवे, जात आत सालासर देवे ।
ध्वजा नारियल भोग देवे, मनोरथ सिद्धि कर लेवे ।
कारज सारों भक्त के, सदा करो कल्याण ।
विप्र निवासी लक्ष्मणगढ़ के, बालकृष्ण धर ध्यान ।
नाम की जपे सदा माला ॥ कृपा कर सालासर वाला …


हर भक्ति की भक्ति के प्राण हो तुम
हर वीर की शक्ति की शान हो तुम
तुम ब्रह्माण्ड में एक हो हनुमंता
वसुधा के लिए वरदान हो तुम
दिन रात लगा रहे प्रभु का
दरबार तुम्हारी आँखों में
हे मारुति
हे मारुति सारी राम कथा का सार तुम्हारी आँखों में
दुनियाँ भर की भक्ति का हैं भंडार तुम्हारी आँखों में

_/l\_ मारुति नंदन नमो नमः कष्ट भंजन नमो नमः
असुर निकंदन नमो नमः श्रीरामदूतम नमो नमः _/l\_


श्रीरामचन्द्र कृपालु भजु मन हरण भव भय दारुणं।
नवकंज-लोचन कंज-मुख कर-कंज पद-कंजारुणं॥१॥

कन्दर्प अगणित अमित छबि नवनील-नीरद सुन्दरं।
पट पीत मानहु तड़ित रुचि शुचि नौमि जनक सुतावरं॥२॥

भजु दीनबंधु दिनेश दानव-दैत्यवंश-निकंदनं।
रघुनंद आनँदकंद कोशलचंद दशरथ-नंदनं॥३॥

सिर मुकुट कुण्डल तिलक चारु उदारु अंग बिभूषणं।
आजानुभुज शर-चाप-धर संग्राम-जित-खरदूषणं॥४॥

इति वदति तुलसीदास शंकर-शेष-मुनि-मन-रंजनं।
मम हृदय-कंज निवास कुरु कामादि खलदल-गंजनं॥५॥

मनु जाहि राचेउ मिलिहि सो बरु सहज सुन्दर सांवरो
करुना निधान सुजान शील सनेहु जानत रावरो॥६॥

ऐहि भांति गौरि अशीश सुनि सिये सहित हिये हर्सि अली।
तुलसि भवानिहि पुजि पुनि पुनि मुदित मन मन्दिर चली।।७।।

जानि गौरि अनुकूल, सिय हिय हरसु न जाहि कहि।
मन्जुल मंगल मूल, बाम अंग फ़रकन लगे।।



कहकर 'जय रघुराज ' की बोले अन्जनिलाल----
"तुझको ही संसार में कहते हैं क्या काल ?
तू लोक्जीत ,तू भवन जीत जगजीत बखाना जाता है I
पर यह शारीर है रामदास जो कालजीत कहलाता है II
मैं महा काल हूँ अरे कल , तुझकाल का विकराल हूँ मैं I
जिसके आधीन है शक्ति तेरी , उस महाशक्ति का लाल हूँ मैं II”
यह कह झट से झपटे पकड़ा – उस करूर काल को क्षण भर में I
ज्यों बालकाल में ले छलांग था धरा दिवाकर को कर में II
त्रिभुवन में हाहाकार हुआ , हिल गया इंद्रपुर ब्रह्मासन I
कैलाश – शिखर पर दोल गया – कैलाश नाथ का योगासन II
इन्द्रादिक सब देवता हो अत्यंत उदास I
आए करने प्राथना --- महावीर के पास II
“बजरंगी हो जाओ शांत सुरगण सब विनय कर रहे हैं I
प्राकृतिक खेल मिट जायेगा , इस कारण देव डर रहे हैं II
लंका को फूंको क्षार करो , कंचन के कोठे तोड़ो तुम I
पर वीर हमारे आग्रह से इस समय कल को छोड़ो तुम II”
छोड़ दिया हनुमान ने अपने कर से काल I
देख दशानन और फिर गरजे आंख निकाल II
इतने में लंका को देखा तो वह अत्यंत चमकती थी I
ज्वाला ज्यों बदती जाती थी त्यों कंचन ज्योति दमकती थी II
आँखों में खटका स्वर्ण तेज सोचा परिणाम लापत का है I
जा पहुंचे तभी सुरंगों में – देखा कोई मुर्दा लटका है II
नीचे सर , उपर पग उसके सांकल से जकड़ी बाहें थी I
फिर देखा मुर्दा जिन्दा है , धीमी धीमी कुछ आहें थी II
कर मुक्त उस बजरंगी ने ‘भय तजो और शांत ’ कहा I
तब सावधान होकर उसने अपना सारा वृतांत कहा II

“धन्य आपको आपने जीवन किया प्रदान I
नाम शानेस्चार दास का सुनिए दया निधान II
मैं अपना फल बतलाने को दशमुख के सम्मुख आया था I
‘आगई साढ़ेसाती तुझपर ’ यह मैंने उसे बतलाया था II
सुनते ही वह तो भवक उठा आँखों को मुझपर लाल किया I
‘पहले तू भोग साडेसाती ’ यह कह बंधी तत्काल किया II
अब तुमने जो उपकार किया उसका है प्रत्युपकार नहीं I
कुछ सेवा लो आभारी से तो अधिक रहेगा भार नहीं II
यह सुनकर बोले महावीर – “यदि सचमुच तुम्ही शनैश्चर हो I
तो आओ थोडा काम करो , जिसका प्रभाव लंका पर हो II
इस चमक –दमक की नगरी पर अपनी दृष्टि फिराओ तुम I
सचमुच है दशा तुम्हारी तो कंचन को लोहा बनाओ तुम II”
दृष्टि शनैश्चर की पड़ी छाया तिमिर अपार I
लंका काली पड़ गयी , गरजे पवनकुमार II
यों उलट पुलट पुर दहन किया मद चूर कर दिया रावण का I
सम्पूर्ण नगर को फूंक दिया घर छोड़ा एक वभिशण का II
सोने की भस्म बनाकर यों कुछ कुछ अलसाने लगे बली I
कूदे तत्काल समुद्र मध्य , निज पूंछ बुझाने लगे बली II
पूंछ बूझा श्रम दूर कर ले छोटा अकार I
पहुंचे माता के निकट फिर श्री वायु कुमार II
बोले – “अब चित उचटता है , अतएव विदा करिएगा माँ I
फिर हाथ कृपा का इस सर पर चलती बिरियाँ धरिएगा माँ II
प्रभु ने जैसे मुंदरी दी थी दें चिन्ह मात भी निज कर से I
सन्देश कहें जो कहना हो कह दूंगा सब श्री रघुबर से II”
इन वचनों से मात को हुआ पूर्ण आह्लाद I
दिया पुत्र हनुमान को आशीर्वाद प्रसाद II

बोलीं –“ लो मेरी चूड़ामणि , उनके चरणों में रख देना I
कर जोड़ और से मेरी फिर , इस भांति निवेदन कर देना II
कर्तव्य समझ कर वे अपना मेरा संकट संबरण करें I
जो बाण जयंता पर छोड़ा वह कहाँ गया ! फिर ग्रहण करें II
यदि एक मॉस के भीतर ही प्रभु आकार नहीं छुड़ायंगे I
तो कह देना जतला देना , फिर मुझे न जीती पायें गे II”
बलवीर , उधर तुम जाते हो , क्या पता इधर क्या होना है I
सांत्वना मिली थी कुछ तुम से , फिर वही रत दिन का रोना है II
पर क्या करिए, परवशता है ! इस कारण धीर धर रही हूँ I
छाती पर पत्थर रखकर मैं तुम को विदा कर रही हूँ II”
ढाढस दे कर शांत कर समझकर बहु बार I
विदा हुए आशीष ले ---श्री अंजनीकुमार II
चलते चलते ऐसे गरजे फट गए कलेजे असुरों के I
वह प्रलय मेघ – सा शब्द हुआ गिर गए गर्भ निशाचारियों के II
सुन अट्टहास का विकट शब्द पृथ्वी , पहाड़ तक दोल उठे I
पहचान घोष बजरंगी का इस पार कीशगण बोल उठे II
Extract from
Radhay Shyam ( Ramayan)



Tuesday, 22 May 2012


Hanuman a brilliant student
In due course of time the investiture ceremony was performed and Hanuman wore the sacred threads. His parents resolved to send him for higher studies to the Sun-god who was well versed in all Vedas, Shastras and mystery of philosophical knowledge. Hanuman, clad in bark garment like a celibate, wearing holy threads of munja (a holy grass), holding a shank of Palas and deer-skin in his hands, stood helplessly and stared at the radiant Sun in dismay. His mother Anjana knew the anathema and its evil effect. She said "O son! why do you stand here and stare desparately? The sun-god is not far away from you. Even in your infancy you had sprung to his chariot. You possess immeasurable and matchless strength. Nothing in the wold is impossible for you. You leap up to him and receive your education." Thereupon Hanuman bowed down his head before his parents in reverential salutation and sprung up and in twinkling of an eye, he arrived before the chariot of the sun-god. After introducing himself along with his father's name, Hanuman stood before the sun-god with his hands folded and prayed with reverence "O God ! after the holy thread-wearing ceremony, my parents have sent me to you for receiving education. Kindly accept me as your humble pupil". His humble but intelligent submission charmed the sun-god, but in order to test the ability and prudence of the boy, he said "O my dear child ! You are fully aware of my chariot, incessantly rolling on without tarrying, brushing aside my hunger, thirst and all kinds of exertions. How can the process of teaching and learning take place unless the preceptor and the receptor sit face to face with tranquil minds." Hanuman replied with reverence "O revered Sir, I shall pace back with my face towards you with the same speed as your chariot rolls ahead. This therefore, will cause no inconvenience or hardship ill teaching and learning." This astute solution propitiated the sun god who readily agreed and within a very short period he taught Vedas, Shastras, Grammar Philosophical Ideologies and mysteries of spiritual perfection. Hanuman became a Savant and Supreme among all erudites. After being well-versed in all abilities and skills. Hanuman humbly offered to pay the fees to his spiritual preceptor, the sun-god, who affectionately said with a happy heart "O my boy ! I need nothing. I only ask you to protect Sugreeve, (the king of monkeys) as he is born of my own part and parcel with my limited power." Hanuman assured his preceptor that no harm would touch Sugreeva till his (Hanuman's) last breath.





श्री राम जय राम जय जय राम..

जय जय विघ्न हरण हनुमान..

जय जय राम दूत हनुमान..

संकट मोचन कृपा निधान ..

श्री राम जय राम जय जय राम..
_/\_ मारुति नंदन नमो नमः _/\_ कष्ट भंजन नमो नमः _/\_
_/\_ असुर निकंदन नमो नमः _/\_ श्रीरामदूतम नमो नमः

श्री हनुमान से प्राथना
पवन - सुवन हनुमान सों, बिनय करौं कर जोरि I
अपनी ओर निहार कै, छिमेव चूक सब मोरी II
संकट - मोचन नाम तव, संकट में मम प्राण I
सुमिरत संकट नसत है, हरु संकट हनुमान !
_/\_ मारुति नंदन नमो नमः _/\_ कष्ट भंजन नमो नमः _/\_
_/\_ असुर निकंदन नमो नमः _/\_ श्रीरामदूतम नमो नमः



तो हनुमंत कहाऊं
हों प्रभु जू को आयसु पाऊँ I
अबहीं जाइ , उपारि लंक गढ़ , उदधि पार लै आऊँ II
अबहीं जंबूद्वीप इहाँ तैं , लै लंका पहुचाऊँ I
सोखि समुद्र उतारों कपि -दल , छिनक बिलंब न लाऊँ II
अब आवैं रघुबीर जीति दल , तो हनुमंत कहाऊँ I
‘सूरदास ’ सुभ पूरी आजोध्या , राघव सुबस बसाऊँ II
_/\_ मारुति नंदन नमो नमः _/\_ कष्ट भंजन नमो नमः _/\_
_/\_ असुर निकंदन नमो नमः _/\_ श्रीरामदूतम नमो नमः


मेरे प्रभु तुम ही तुम हो
मेरी हस्ती तुम ही तुम हो
मेरे रोम -रोम में तुम ही तुम हो
इस संसार के रक्षक तुम ही तुम हो




चार आशीर्वाद
किसी जंगल में एक शिकारी जा रहा था , रास्ते में घोड़े पर सवार एक राजकुमार उसे मिला. वह भी उसके साथ हो लिया. आगे उनको एक तपस्वी और साधू मिले वे दोनों भी उनके साथ चल दिये.उन चरों को जंगल में एक कुटिया दिखाई दी. उसमें एक बूढ़े बाबा जी बैठे थे. वे चारो अंदर गये, बाबा जी को प्रणाम किया और बाबा जी ने उन चरों को आशीर्वाद दिये.
बाबा जी ने राजकुमार को कहा की तुम चिरंजीव रहो. तपस्वी से कहा --'ऋषि पुत्र तुम मत जिओ ' साधू से कहा --' तू चाहे जिओ चाहे मरो जैसी तुम्हारी मर्ज़ी .और शिकारी से कहा,---'तुम न जिओ न मरो '. बाब जी चरों को आशीर्वाद दे कर चुप हो गये. चरों आदमियों को बाबा जी का आशीर्वाद समझ में नहीं आया. उनहोंने प्रार्थना की कृपा करके आपना तात्पर्य समझायें.
बाब जी बोले -राजा को मर कर नरक में जाना पड़ता है . मनुष्य पहले ताप करता है, ताप के प्रभाव से राजा बनता है और फिर मरकर नरक मैं जाता है ---' तपेश्वरी राजेश्वरी, राजेश्वरी नरकेश्वरी '. इसीलिए रजा को मैंने जीते रहने का आशीर्वाद दिया.जीता रहे गा तो सुख पायेगा.
तपस्या करने वाला जीता रहेगा तो तो ताप करके शारीर को कष्ट देता रहेगा. वह मर जायेगा तो तपस्या के प्रभाव से स्वर्ग में जाये गा अथवा रजा बनेगा. इसीलिए उस को मरजाने का आशीर्वाद दिया ताकि वह सुख पाये.
शिकारी दिनभर जीवों को मारता है. वह जिए गा तो जीवों को मरेगा और मरेगा तो नरक में जाये गा इसीलिए मैंने उसे कहा कि तुम न जिओ न मरो.
साधू जीता रहेगा तो वह भजन स्मरण करेगा, दूसरों का उपकार करेगा और मर जायेगा तो भगवान् के द्वार में जाये गा. वह जीता रहेगा तो भी आनन्द में मर जाये तो भी आनन्द है .इसी लिए मैंने उसको दिया तुम चाहे जिओ चाहे मरो जैसी तुम्हारी मर्ज़ी.
राजपुत्र चिरंजीव मा जीव ऋषिपुत्रक : I
जीव व मर व साधू व्याध मा जीव मा मर : II

मनुष्य को अपना जीवन ऐसा बनाना चाहिये कि जीते मौज रहे और मरकर भी मौज रहे ! साधू बनना है पर साधू का विश धारण करने कि जरूरत नहीं! गृहस्थ में रहते हुए भी मनुष्य साधू बन सकता है. भगवन भजन करता रहे और दूसरों कि सेवा करता रहे तो यहाँ भी आनन्द है और वहां भी आनन्द है. दोनों हाथों में लड्डू हैं ! कबीर जी ने कहा है --
सब जग डरपे मरण से, मेरे मरण आनन्द I
कब मरिये कब भेटिये , पूरण परमानन्द II

GeetaPress Gorakhpur




बाला जी चले आओ, हनुमान चले आओ
आवाज मेरी सुनकर एक बार चले आओ
मझधार पड़ी नैया, खेने वाला कोई नहीं
मांझी बनकर बाबा इसे पार लगा जाओ
बाबा जी चले आओ -------
दुष्टों ने घेरा है, बाबा ये सेवक तेरा है
अपने इस सेवक को, दुष्टों से बचा जाओ
बाबा जी चले आओ -------
मैं तड़प तड़प कर आवाज लगता हूँ
अगर प्रेम है भक्तों में तो आज निभा जाओ
बाबा जी चले आओ -------
तुम घट घट के हो वासी, बाबा अंतरयामी हो
इस दुःख भरे दिल को खुशियों से भर जाओ
बाबा जी चले आओ -------
मेरे चारो तरफ बाबा, छाया घोर अँधेरा है
पूजा भी अधूरी है, सेवा भी अधूरी है
सिया राम लखन ले बाबा, इस दुःख से पर लगाओ
मेरे सामर्थ्य स्वामी को, किया लाचारी है
वो करेगी किया किस्मत, जहाँ तेरी राजी है
सामर्थ्य दिखाकर के, अब धीर बंधा जाओ
बाबा जी चले आओ -------
_/\_ मारुति नंदन नमो नमः _/\_ कष्ट भंजन नमो नमः _/\_
_/\_ असुर निकंदन नमो नमः _/\_ श्रीरामदूतम नमो नमः


संकट मोचन तू कॆहलाये
राम बिना तुझे कुछ् न भाये
तेरा द्वार् जो भी खट् काये
बिन् कुछ् पाये घर् नही जाये

दुर्बल् को बलवान् बनाये
हर् संकट् पल् मे टल् जाये
तेरा गान् करे जो कोयी
उसे न कोयी विपदा होयी

हर् मुष्किल् आसान् तु कर् दे
भक्तजनों के दुःख् तू हर् ले
मन् के अंधियारों को मिटा के
भवसागर् से पार् करादे

सच्चिदानंद हे प्रिय हनुमान्
दूर् करो मेरा अज्ञान्
थका बहुत् जीवन् चक्कर् से
कृपा निधान् दो निर्वाण्




जय श्री हनुमान

चरण शरण में आय के, धरूं तिहारा ध्यान .
संकट से रक्षा करो, पवनपुत्र हनुमान ..

दुर्गम काज बनाय के, कीन्हें भक्त निहाल .
अब मोरी विनती सुनो, हे अंजनि के लाल ..

हाथ जोड़ विनती करूं, सुनो वीर हनुमान .
कष्टों से रक्षा करो, राम भक्ति देहुँ दान,
पवनपुत्र हनुमान ..
_/\_ मारुति नंदन नमो नमः _/\_ कष्ट भंजन नमो नमः _/\_
_/\_ असुर निकंदन नमो नमः _/\_ श्रीरामदूतम नमो नमः




हे संकट मोचन, हे दयानिधान,हे वीर बजरंगी हे वीर हनुमान
यह एहसास की 'तुम मेरे भी हो' हे शंकर सुवन महा बली हनुमान
भर देता है मुझ में असीम शक्ति और कर देता है सुगम सब काज
क्यों न मानूँ, क्यों न पूजूं ,क्यों न ध्याऊँ तुम को हे मेरे भगवान्
इक 'तेरा दर तो है' जिसने मुझे है सम्भाला हे शंकर सुवन महाबली हनुमान
मैं तो इस माया भंवर में कभी इधर फसा कभी उधर फसा हे मेरे भगवन
दर तेरा बना मांझी मेरा बन खैव्य्या जीवन सवांरा हे शंकर सुवन महाबली हनुमान
क्यों न मानूँ, क्यों न पूजूं ,क्यों न ध्याऊँ तुम को हे मेरे भगवान्
सबसे सुगम है रस्ता तेरा हर युग के तुम हो भगवान
राम नाम की माला से ही, राम नाम के ही जाप से
खुश होते मेरे भगवन, कर देते पूरण जीवन के सब काम
क्यों न मानूँ, क्यों न पूजूं ,क्यों न ध्याऊँ तुम को हे मेरे भगवान्

मारुति नंदन नमो नमः
कष्ट भंजन नमो नमः
असुर निकंदन नमो नमः
श्रीरामदूतम नमो नमः




अंजनि पुत्र केसरी नंदन, पवन पुत्र गुण वान,
अष्टम रूद्र महा बलशाली बजरंगी बलवान ||
राम मुद्रिका दे सीता को फूँक दिए नव प्राण,
दिया मुग्ध हो कर माता ने अष्ट सिद्धि वरदान ||
हे सकल गुण निधान, हे मेरे भगवान
शरण में आये हैं हम तुम्हारी,दया करो हे दयालु भगवन ।
जय रघुनन्दन जय सियाराम |
हे दुखभंजन तुम्हे प्रणाम ||





“God does not Exist”
A man went to a barbershop to have his hair cut and his beard trimmed.
...
As the barber began to work, they began to have a good conversation.

They talked about so many things and various subjects. When they eventually touched on the subject of God, the barber said: "I don't believe that God exists."
"Why do you say that?"asked the customer.

"Well, you just have to go out in the street to realize that God doesn't exist.

Tell me, if God exists,would there be so many sick people? Would there be abandoned children? If God existed, there would be neither suffering nor pain. I can't imagine loving a God who would allow all of these things."

The customer thought for a moment, but didn't respond because he didn't want to start an argument.

The barber finished his job and the customer left the shop. Just after he left the barbershop, he saw a man in the street with long, stringy, dirty hair and an untrimmed beard. He looked dirty and un-kept.

The customer turned back and entered the barber shop again and he said to the barber: "You know what? Barbers do not exist."

"How can you say that?"asked the surprised barber. "I am here, and I am a barber. And I just worked on you!"

"No!" the customer exclaimed. "Barbers don't exist because if they did, there would be no people with dirty long hair and untrimmed beards, like that man outside."

"Ah, but barbers DO exist! What happens is, people do not come to me."

"Exactly!"- affirmed the customer. "That's the point! God, too, DOES exist! What happens, is, people don't go to Him and do not look for Him. That's why there's so much pain and suffering in the world." ~




Jataayu
Shri Ram & Lakshman Washing the Wounds of Jatayu
O Ram ji! Whoever you are pleased with is a pure and truly virtuous soul.When did the dancing girl(*Pingla), vulture (*Jatayu) and hunter (*Valmiki), who went to Vaikunth, the supreme abode, do austere penance in Prayag (a pilgrimage place at the confluence of Ganges and Jamuna in Allahabad)and died by burning in the fire of dry dung?